Summary of “Portrait of a lady” by Khushwant Singh in Hindi

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खुशवन्त सिंह भारत के एक प्रसिद्ध पत्रकार, लेखक, उपन्यासकार और इतिहासकार थे। एक पत्रकार के रूप में उन्हें बहुत लोकप्रियता मिली। उन्होंने पारम्परिक तरीका छोड़ नये तरीके की पत्रकारिता शुरू की। भारत सरकार के विदेश मन्त्रालय में भी उन्होंने काम किया। 1980 से 1986 तक वे राज्यसभा के मनोनीत सदस्य रहे।

खुशवन्त सिंह का जन्म 2 फ़रवरी 1915 को हदाली, पंजाब (अविभाजित भारत) में एक सिख परिवार में हुआ था। उन्होंने गवर्नमेण्ट कॉलेज, लाहौर और कैम्ब्रिज यूनीवर्सिटी लन्दन में शिक्षा प्राप्त करने के बाद लन्दन से ही क़ानून की डिग्री ली। उसके बाद उन्होंने लाहौर में वकालत शुरू की। उनके पिता सर सोभा सिंह अपने समय के प्रसिद्ध ठेकेदार थे। उस समय सोभा सिंह को आधी दिल्ली का मालिक कहा जाता था।

खुशवन्त सिंह ने कई अमूल्य रचनाएं अपने पाठकों को प्रदान की हैं। उनके अनेक उपन्यासों में प्रसिद्ध हैं – ‘डेल्ही’, ‘ट्रेन टू पाकिस्तान’, ‘दि कंपनी ऑफ़ वूमन’। इसके अलावा उन्होंने लगभग 100 महत्वपूर्ण किताबें लिखी। अपने जीवन में सेक्स, मजहब और ऐसे ही विषयों पर की गई टिप्पणियों के कारण वे हमेशा आलोचना के केंद्र में बने रहे। उन्होंने इलेस्ट्रेटेड विकली जैसी पत्रिकाओं का संपादन भी किया।

 

Summary of “Portrait of a lady” by Khushwant Singh in Hindi

 

खुशवंत सिंग ने अपनी दादी का एक ज्वलंत वर्णन प्रस्तुत करके कहानी शुरू की जिसे वह पिछले 20 साल से जानता था। उनकी वर्तमान स्थिति को देखते हुए, उनके लिए यह स्वीकार करना मुश्किल था कि उनकी दादी कभीएक युवा और सुंदर महिला थीं और यहां तक कि उनका एक पति भी था।

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जब लेखक जवान था, तो उसके माता-पिता शहर में रहने के लिए गए, और उसे अपनी दादी के साथ छोड़ गए। वे अच्छे दोस्त थे। वह सुबह उठकर उसे नहलाती थी, तैयार करती थी एवं स्कूल लेकर जाती थी। स्कूल के बगल में ही एक मंदिर भी था। जब तक लेखक स्कूल में रहकर पढ़ाई करता था। तब तक उसकी दादी मंदिर में पूजा पाठ करती थी। फिर स्कूल ख़तम हो जाने पर दोनों घर आ जाते थे। वे रोजाना कुत्तों को रोटी खिलाते थे।


उनकी दोस्ती में मोड़ आया जब लेखक के माता-पिता ने उन्हें दूसरे स्कूल में भेजना शुरू कर दिया। अब उनकी दादी उन्हें छोड़ने नहीं जाती थी बल्कि अब वह मोटर बस में स्कूल जाते थे। जहाँ पर उनकी शिक्षा अंग्रेजी में होती थी और उन्हें विज्ञान और संगीत सिखाया जाता था।  लेखक की दादी ने अब आंगन में चिड़ियों को खिलाना शुरू कर दिया। अब लेखक एक अंग्रेजी स्कूल गए और विज्ञान और संगीत सीखा। उनकी दादी ने इसे स्वीकार नहीं किया क्योंकि वह विज्ञान में विश्वास नहीं करती थीं और संगीत को केवल वेश्याओं और भिखारी के एकाधिकार के रूप में मानती थी। वह परेशान थी कि उस स्कूल में भगवान और शास्त्रों के बारे में कोई शिक्षा नहीं दी जाती थी।

जब खुशवंत सिंह विश्वविद्यालय गए, तो उन्हें अपना निजी कमरा दिया गया। जिसकी वजह से उनके और उनकी दादी की बिच और भी दुरी बढ़ गई। अब उनकी दादी हमेसा व्हील चेयर में बैठी रहती है और साम को चिड़ियों को खिलाने जाती है।

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जब लेखक अपने उच्च अध्ययन के लिए विदेश जा रहे थे, तो उन्हें पता था कि उनकी दादी परेशान होगी। वह उसे देखने के लिए रेलवे स्टेशन गई लेकिन कुछ भी नहीं कहा। वह अपनी प्रार्थनाओं में उलझ गई थी। उन्होंने चुपचाप उनके माथे को चूमा, और खुसवंत सिंह ने शायद उनके बीच शारीरिक संपर्क का अंतिम संकेत माना। लेकिन जब वह पांच साल बाद घर आया, तो वह फिर से स्टेशन पर उससे मुलाकात करने आई। अपने आगमन के पहले दिन भी, उनकी दादी के सबसे खुशी के क्षण चिड़ियों के साथ बिताए गए लम्हे ही थे। शाम को, उसने प्रार्थना नहीं की लेकिन उसने अपने पड़ोस की महिलाओं को इकट्ठा किया, एक ड्रम लिया और कई घंटों तक गाया।

अगली सुबह वह बीमार हो गई थी। डॉक्टर ने उन्हें आश्वासन दिया कि बुखार ठीक हो जाएगा लेकिन उनकी दादी अलग सोच रही थीं। उसने बात करना बंद कर दिया क्योंकि उसने महसूस किया कि उसका अंत निकट था। वह अपने चेहरे पर एक शांतिपूर्ण मुस्कान से साथ अपने बिस्तर में लेटे हुए मर गई।

उसकी मृत्यु के बाद, उसके शरीर को लाल कफ़न में लपेटकर फर्श पर रखा गया था। यह आश्चर्यजनक था कि उसके शरीर के चारों ओर फर्श पर हजारों चिड़ियों आ गई थी। लेखक की मां ने उनके लिए कुछ ब्रेडक्रंब लाए लेकिन उन्होंने नहीं खाया। जब उन्होंने अपनी दादी की लाश को उठाया, तो सारी चिड़िया भी चुप चाप उड़ गई।