Summary of Enterprise by Nissim Ezekiel in Hind

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About the Poet Nissim Ezekiel in Hind:

Nissim Ezekiel को आजादी के बाद भारतीय-अंग्रेजी कविता के पिता के रूप में माना जाता हैं। वह एक ऐसे लेखक हैं जिन्होंने भारतीय-अंग्रेजी कविता में आधुनिकता की सुरुवात की थी। उनके सरल, भासा की शैली ने बाद में कई भारतीय अंग्रेजी कवियों को प्रभावित किया।

कवि नाटककार, संपादक एवं उसके साथ ही कला-आलोचक थे। उनका जन्म 14 दिसंबर सन 1924 में मुंबई में हुआ था। Ezekiels मुंबई के यहूदी समुदाय के थे, जिन्हे ‘Bene Israel के नाम से जाना जाता है। सन 1947 में Ezekiel ने मुंबई यूनिवर्सिटी में english literature में MA किया था। फिर लंदन के Birbeck College में फिलॉसोफी पड़ना शुरू किआ। सन 1952 में उन्होंने Daisy Jacob से शादी किया और उसी साल उन्होंने अपनी  सबसे पहली कविता का संग्रह  A Time to Change ,  Fortune Press (लंदन) द्वारा प्रकाशित किया। अगले साल घर लौटते ही  Ezekiel ने The Illustrated Weekly of India में एक assistant editor के रूप में नौकरी सुरु किया और 2 साल तक वहीं रहे।

उन्हें कई सारे अवार्ड्स से सम्मानित किया जैसे अकादमी अवार्ड्स एवं पद्मा श्री अवार्ड्स।

Summary of Enterprise by Nissim Ezekiel in Hind :

Lines 1 – 5:

It started as a pilgrimage

Exalting minds and making all

The burdens light. The second stage

Explored but did not test the call.

The sun beat down to match our rage.

पहले छंद में कवि ने अपने तीर्थ यात्रा के सुरुवात का वर्णन किआ है जो उन्होंने अपने कुछ साथीयों के साथ शुरू किआ था। फिर कवि ने बताया की उन्होंने ये तीर्थ यात्रा इस सोच में सुरु किआ था की उनमे से सब अपना जीवन बिना किसी दबाव से गुज़ार सके क्यों की कही न कही हर एक इंसान को दबाव का शिकार होना पड़ता है। फिर कवी ने इस तीर्थ यात्रा के दूसरे पड़ाव का बर्णन करते हुए कहा की, क्या भगवान सचमे चाहते हैं की वो ये यात्रा शुरू करे, लेकिन फिर भी कोई भी सोच उनको ये तीर्थ यात्रा को बंद नहीं करवा सकता। और वो इसके बावजूद भी यात्रा करने के लिए तैयार थे उनमे इस यात्रा के प्रति जो उत्साह था उसकी तुलना किसी चमकते हुए सूर्य के साथ की जा सकती है।

Lines 6 – 9:

We stood it very well, I thought,

Observed and put down copious notes

On things the peasants sold and bought

The way of serpents and of goats.

इन लाइनों में कवी कहते हैं की वह और उनके साथ तीर्थ यात्रि बिना किसी परेशानी के उस सूरज की धुप को सहते हुए आगे बढ़ रहे थे। तीर्थ यात्रा करते समय अपने चारो ओर बहुत ही ध्यान से सब देखने लगे और जो भी महत्वपूर्ण लगा उसे लिख लेने लगे। सबने लिखा की वहां के किसान किस तरह के वस्तुओं का आदान प्रदान करते हैं, और वहां रहने वाले जिव जन्तुओ जैसे snake and the goat का चाल चलन (habits and habitat) कैसा है।

Lines 10 – 15:

Three cities where a sage had taught

But when the differences arose

On how to cross a desert patch,

We lost a friend whose stylish prose

Was quite the best of all our batch.

A shadow falls on us and grows.


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इन लाइनों में, कवी कहते हैं की वो और उनके साथी यात्रि जब तीन शहर से होकर गुज़र, रहे थे तब एक साधु ने उन लोगो को कुछ शिक्षा दि। लेकिन बहुत ही जल्द यात्रियों के लिए ये सुंदरता जाने लगी और सभी के सामने कई सारे मुश्किलें आ गयी । तीर्थ यात्रियाँ एक शुष्क रेगिस्तान से गुज़रा , लेकिन कई सारे यात्रियाँ अपने आप में विरोध करने लगे की कौन सा रास्ता सही है और कौन सा गलत जिसके फल स्वरुप उन्होंने अपने दल के एक बहुत ही महत्वपुर्ण सदस्य को खो दिए जिनकी गद्य(prose writing) सबको बेहद पसंद थी। इसी कारण वश सभी यात्रि निराश होकर अपने मंज़िल में चलते लगे।

Lines 16 – 19:

Another phase was reached when we

Were twice attacked, and lost our way.

A section claimed its liberty

To leave the group. I tried to pray.

इन लाइनों में कवि ने तीर्थ यात्रा के अगले पड़ाव का वर्णन किया है। वो कह रहे हैं की सभी यात्रियाँ परदो बार हमले हुए।  जिसके कारण समूह का एक हिस्सा अपने तरीके से जाने का फैसला करने लगा।  बिच में कवी इतना निराश हो उठे की वह इस स्थिति से बाहर निकलने के लिए प्रार्थना करने लगे।

Lines 20 – 24:

Our leader said he smelt the sea

We noticed nothing as we went,

A straggling crowd of little hope,

Ignoring what the thunder meant,

Deprived of common needs like soap.

इन लाइनों में कवि कहते है की रेगिस्तान से यात्रा करते समय सबको इतना प्यास लग गया था की सब आशा करने लगे की सामने ही उनको पानी मिल जाए, ठीक उसी समय दल का एक नेता बोल उठा की उन्हें सामने एक समुन्दर महसूस हो रहा है। लेकिन किसी को उनकी बात पर यकींन नहीं हुआ और धीरे धीरे सब अपने मंज़िल पर चलते रहे, और कोई कोई एकदम पीछे छूट जा रहा था। सब इतना थक गए थे की उन लोगो का दिमाग काम करना बंद कर चूका था। और किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था की वो कहाँ से गुज़र रहे हैं। और रस्ते में यात्रिओं  को क्या क्या नज़ार आ रहा हैं। इतने वक़्त में यात्रियों का उत्साह कहीं खो सा गया था। जब उन्होंने बिजली की आवाज़ सुनी तो किसी को समसझ नहीं आया की सामने कौन सी मुसीबत आने वाली हैं और वो बस आगे चलते रहें। उन लोगो के पास साधारण प्रबंधन जैसे की साबुन तक भी नहीं था।

Lines 25 – 30:

Some were broken, some merely bent.

When, finally, we reached the place,

We hardly know why we were there.

The trip had darkened every face,

Our deeds were neither great nor rare.

Home is where we have to gather grace.

इन अंतिम लाइनों में कवी उस परिस्थिति को दर्शाता हैं जब सभी यात्रियाँ आखिर में तीर्थ तक पहुंच चुके थे। किसी किसी में वो जूनून बिलकुल खो चूका था और किसी किसि को लगा की शायद कुछ ही समय में उनका तीर्थ यात्रा का जूनून फिरसे लौट आएगा। हालाँकि किसी को ये समझ में नहीं आया की आखिर क्यों वे यहाँ आए हैं। क्यों की इस यात्रा से सबको कही न कही बहुत निराशा ही हुई थी। अपने मंज़िल तक पहुंचने के बाद भी किसी को उत्सुकता नहीं हुई क्यों की किसी ने भी कुछ असाधारण या महान कार्य करने का अनुभव नहीं किया। उनको अंत में ये मह्सूस हुआ की ये तीर्थ यात्रा बिलकुल ही बेकार चीज़ हैं क्यों की हम घर में रहकर भी भगवन की पूजा कर सकते हैं अपनी तरह से।

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