यह दंतुरित मुसकान एवं फसल – नागार्जुन

कक्षा – 10 ‘अ’ क्षितिज भाग 2 पाठ 6

  यह दंतुरित मुसकान एवं फसल – नागार्जुन

 

यह दंतुरित मुसकान एवं फसल कविता का सारांश :

यह दंतुरित मुसकान में कवि ने एक बच्चे की मुसकान का बड़ा ही मनमोहक चित्रण किया है। कवि के अनुसार किसी बच्चे की मुसकान में इतनी शक्ति है की वह किसी मुर्दे में भी जान डाल शक्ति है। कवि के अनुसार एक बच्चे की मुसकान को देखकर हम अपने सब दुःख भूल जाते हैं और हमारा अन्तःमन प्रसन्न हो जाता है। बच्चे को धूल में लिपटा घर के आँगन में खेलता देखकर कवि को ऐसा प्रतीत होता है मानो किसी झोपडी में कमल खिला हो। कवि ने यहाँ बाल अवस्था में एक बालक द्वारा किये जाने वाले चीजों का बहुत ही सुन्दर वर्णन किया है। जैसे जब कोई बालक किसी वयक्ति को नहीं पहचानता है तो उसे सीधे नजरो से नहीं देखता है लेकिन एक बार पहचान लेने के बाद उसे एक टक आँखों से देखता रहता है।

फसल में कवि ने किसानो के परिश्रम एवं प्रकृति की महानता का गुणगान किया है। उनके अनुसार फसल पैदा करना किसी एक वयक्ति के बस की बात नहीं। इसमें प्राकृति एवं मनुष्य दोनों का तालमेल लगता है। बीज को अंकुरित होने के लिए धुप, वायु, जल, मिट्टी एवं मनुष्य के कठोर परिश्रम की जरुरत पड़ती है। तब जाकर फसल पैदा होते हैं।

 

यह दंतुरित मुसकान भावार्थ :

 

तुम्हारी यह दंतुरित मुसकान

मृतक में भी डाल देगी जान

धूलि-धूसर तुम्हारे ये गात….

छोड़कर तालाब मेरी झोंपड़ी में खिल रहे जलजात

परस पाकर तुम्हारा ही प्राण,

पिघलकर जल बन गया होगा कठिन पाषाण

छू गया तुमसे कि झरने लग पड़े शेफालिका के फूल

बाँस था कि बबूल?

भावार्थ :- प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने एक दांत निकलते बच्चे के मधुर मुस्कान का मन मोह लेने वाला वर्णन किया है। कवि के अनुसार एक बच्चे की मुस्कान मृत आदमी को भी जिन्दा कर सकती है। अर्थात कोई उदास एवं निराश आदमी भी अपना गम भूलकर मुस्कुराने लगे। और बचे घर के आँगन में खेलते वक्त खुद को गन्दा कर लेते हैं धूल से सन जाते हैं, उनके गालों में भी धूल लग जाती है। और कवि को यह दृश्य देखकर मानो ऐसा लगता है जैसे किसी तालाब से चलकर कमल का फूल उनकी झोपडी में खिला हुआ हैं। कवि को ऐसा प्रतीत हो रहा है की अगर यह बालक किसी पत्थर को छू ले तो वह भी पिघलकर जल बनकर बहने लगे। और अगर यह किस पेड़ को छू ले फिर चाहे वो बांस के पेड़ हो या फिर बबूल हो उनसे शेफालिका के फूल ही झरेंगे।

अर्थात बच्चे के समक्ष कोई कोमल ह्रदय वाले इंसान हो या फिर पत्थर दिल वाले लोग। अभी अपने आप को बच्चे को सौंप देते हैं और वह जो करवाना चाहता है वो करते हैं एवं उसके साथ खेलते हैं।

 

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तुम मुझे पाए नहीं पहचान?

देखते ही रहोगे अनिमेष!

थक गए हो?

आँख लूँ मैं फेर?

क्या हुआ यदि हो सके परिचित न पहली बार?

यदि तुम्हारी माँ न माध्यम बनी होती आज

मैं न सकता देख

मैं न पाता जान

तुम्हारी यह दंतुरित मुसकान

भावार्थ :-  कवि जब पहली बार शिशु को देखता है तो वह कवि को पहचान नहीं पता और कवि को एकाटक बिना पालक झपकाए देखने लगता है और कुछ समय तक देखने के पश्चात् कवि कहता है। क्या तुम मुझे पहचान नहीं पाए हो ? कितने देर तुम इस प्रकार बिना पालक झपकाए एकटक मुझे देखते रहोगे ? कहीं तुम थक तो नहीं गए ? मुझे इस तरह देखते देखते। अगर तुम थक गए हो तो मैं अपनी आँख फेर लेता हूँ फिर तुम आराम कर सकते हो।

और कोई बात नहीं अगर हम इस मुलाकात में एक दूसरे को पहचान नहीं पाए तो। तुम्हारी माँ हमें मिला देगी और फिर मैं तुम्हे जी भर देख सकता हूँ तुम्हारे मुख मंडल को निहार सकता हूँ। और तुम्हारे इस दंतुरित मुसकान का आनंद ले सकता हूँ।

 

धन्य तुम, माँ भी तुम्हारी धन्य!

चिर प्रवासी मैं इतर, मैं अन्य!

इस अतिथि से प्रिय तुम्हारा क्या रहा संपर्क

उँगलियाँ माँ की कराती रही हैं मधुपर्क

देखते तुम इधर कनखी मार

और होतीं जब कि आँखें चार

तब तुम्हारी दंतुरित मुसकान

मुझे लगती बड़ी ही छविमान!

भावार्थ :- प्रस्तुत पंक्तियों में कवि अपने पुत्र के बारे में बताता है की उसके नए नए दांत निकलना सुरु हुए हैं। और कवि बहुत दिनों बाद अपने घर वापस लौटा है इसलिए उसका पुत्र उसे पहचान नहीं पा रहा। आगे कवि लिखते हैं की बालक तो अपने मन मोह लेने वाले छवि के कारण धन्य है ही और उसके साथ साथ तम्हारी माँ भी धन्य है जिसने तम्हे जन्म दिया और जो रोज तुम्हारे दर्शन का लाभ उठा रही है। और एक तरफ मैं दूर रहने के कारण तम्हारे दर्शन भी नहीं कर पता एवं अब तम्हे पराया भी लग रहा हूँ। और एक तरह से यह ठीक भी है क्यूंकि मुझसे तम्हारा संपर्क ही कितना है। यह तो तम्हारी माँ की उँगलियाँ ही है जो तम्हे मधु पाक कराती है रोज। और तम इस तरह तिरछी नजरों से मुझे देखते देखते जब हमारी आंख एक दूसरे से मिलती है और मेरी आँखों में स्नेह देखकर जब तुम मुस्कुराने लगते हो तो वह मेरे मन को मोह लेता है।

फसल कविता का भावार्थ :

एक के नहीं,

दो के नहीं,

ढ़ेर सारी नदियों के पानी का जादू :

एक के नहीं,

दो के नहीं,

लाख-लाख कोटि-कोटि हाथों के स्पर्श की गरिमा:

एक की नहीं,

दो की नहीं,

हजार-हजार खेतों की मिट्टी का गुण धर्म:

भावार्थ :- प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने हमें यह बताने का प्रयास किया है की फसल किसी एक वयक्ति के परिश्रम या फिर केवल जल या मिट्टी से नहीं उगता है। इसके लिए बहुत सारे अनुकूल वातावरण की जरूरत होती हैं। और इसी के बारे में आगे लिखते हुए कवि ने कहा है की एक नहीं दो नहीं लाखो लाखो नदी के पानी के मिलने से यह फसल पैदा होती है। क्युकी किसी एक नदी में केवल एक ही प्रकार के गुण होते हैं लेकिन जब कई तरह के नदी आपस में मिलते हैं तो उनमे सारे गुण आ जाते हैं जो बीजों को अंकुरित होने में साहयता करते हैं और फसल खिल उठते हैं। ठीक इसी प्रकार केवल एक या दो नहीं बल्कि हज़ारो लाखो लोगो की मेहनत और पसीने से यह धरती उपजाऊ बनती है और उसमे बोये गए बीज अंकुरित होते हैं। और इसी प्रकार खेतों में केवल एक खेत की मिट्टी नहीं बल्कि कई खेतों की मिट्टी मिलती है तब जाकर वह उपजाऊ बनती है।

 

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फसल क्या है?

और तो कुछ नहीं है वह

नदियों के पानी का जादू है वह

हाथों के स्पर्श की महिमा है

भूरी-काली-संदली मिट्टी का गुण धर्म है

रूपांतर है सूरज की किरणों का

सिमटा हुआ संकोच है हवा की थिरकन का!

भावार्थ :-  प्रस्तुत पंक्तियों में कवि हमसे यह प्रश्न करता है की यह फसल क्या है अर्थात यह कहाँ से और कैसे पैदा होता है ? इसके बाद कवि खुद इसका उत्तर देते हुए कहते हैं की फसल और कुछ नहीं बल्कि नदियों के पानी का जादू है। किसानो के हातों के स्पर्श की महिमा है। यह मिट्टियों का ऐसा गुण है जो उसे सोने से भी ज्यादा मूलयवान देती है। और यह सूरज की किरणों एवं हवा का उपकार है। जिनके कारन यह फसल पैदा होती है।

अर्थात अपने इस पंक्ति में कवि ने हमें यह बताने का प्रयास किया है की फसल कैसे पैदा होती है। हम इसी अनाज के कारण जिन्दा है तो हमें यह जरूर यह पता होना चाहिए की आखिर इन फसलों को पैदा करने में नदी, आकाश, हवा, पानी, मिट्टी एवं किसान के परिश्रम की जरूरत पड़ती है और हम उनके महत्व को समझ सके।