उत्साह एवं अट नहीं रही है- सूर्यकांत त्रिपाठी निराला (Suryakant Tripathi Nirala)

Last updated on May 16th, 2020 at 12:44 pm

कक्षा – 10 ‘अ’ क्षितिज भाग 2 पाठ 5

उत्साह एवं अट नहीं रही है- सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

 

उत्साह एवं अट नहीं रही है सारांश:- 

 

उत्साह कविता निराला जी के सबसे पसंदीदा विषय बादल पर रचित है । यह कविता बादल  के रूप में आये दो अलग तरह के बदलावों को दर्शन चाहती है । इस कविता के माध्यम से निराला जी ने जीवन को एक अलग दिशा देने के रूप मैं प्रतीत करने को कहा है, एक तरफ जहाँ दुखी एवम पीड़ितों की प्यास बुझाने को बादल आया है जिससे वे ऐसे निराश लोगो को जिन्होंने कुछ करने की एवम पाने की उम्मीद को छोड़ दिया है उन्हें वापिस से प्रेरित करना चाहते हैं की उनके दुःख खतम होने वाले हैं एवम खुशहाल जीवन आने वाला है । दूसरी शिक्षा देते हुए उन्होंने यह कहा है की जिस तरह बादल नए अंकुरित लेके आता है इसी तरह हमे भी जीवन की नयी शुरुआत करनी चाहिए एवम उससे आगे बढ़ने की प्रेरणा लेनी चाहिए । यह कविता सोती हुई क्रांति को फिर से जगाने के लिए लिखी गयी है ।

अट नहीं रही है कविता में कवि ने प्रकृति की वयापकता का वर्णन बड़े ही सुन्दर ढंग से किया है। उन्होंने होली के समय जो महीना होता है उसे फागुन कहा जाता है और उस महीने में होने वाले प्राकृतक एवं मानवीय मन में होने वाले बदलाव को बड़े ही सुंदरता से दिखलाया है। पूरी प्रकृति खिल सी जाती है। हवाएं मस्ती में बहने लगती है फूल खिल उठते हैं एवं गगन में उड़ते पक्षी मन को मोह लेने वाले लगते हैं और इस तरह प्रकृति को मस्ती में देखकर मनुष्य भी मस्ती में आ जाता है और फागुन के गीत होरी, फाग इत्यादि गाने लगते हैं।

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उत्साह एवं अट नहीं रही कविता का भावार्थ :- 

 

बादल, गरजो!

घेर   घेर    घोर      गगन,   धाराधर  ओ !

ललित       ललित,      काले       घुंघराले,

बाल        कल्पना       के -से         पाले,

विधुत-छबि उर में, कवि, नवजीवन वाले !

वज्र        छिपा,        नूतन         कविता

फिर भर दो –

बादल गरजो !

भावार्थ :- प्रस्तुत पंक्तियों में जहाँ एक और कवि ने बारिश होने से पहले आकाश में जो बादल दिखाई देते हैं काले काले और वो जैसे गरजते एवं बिजली जैसे चमकती है उसका वर्णन  किया है वहीँ दूसरी और उसे नया  जीवन प्रदान करने वाला भी कहा है और यह हमारे अंदर साहस जगाने का काम भी करता है। तो चलिए आगे देखते हैं कैसे कवि बादाल से बरसने को कह रहा है वो कह रहा है की काले रंग के सुन्दर घुंघराले बादल तुम पुरे आकाश में फैलकर उसे घेर लो और खूब गरजो। कवि ने यहाँ बादल का मानवीयकरण करते हुए उसकी तुलना एक बच्चे से की है जो गोल मटोल सा होता है और जिसके सर पर घुंगराले एवं काले बाल होते हैं जो देखने में बहुत प्यारे और सुन्दर लगते हैं कवि को बादल ऐसे ही प्रतीत हो रहे हैं। आगे कवि बादल की गर्जन में क्रान्ति का संदेश सुनते हुए कहता है हे बादल तुम अपने बिजली के प्रकाश हमारे अंदर पुरुषार्थ भर दो और इस तरह एक नए जीवन का संचार करो। क्यूंकि बादल में वर्षा की सहायता से नए जीवन को उत्पन्न करने की शक्ति होती है इसीलिए कवि बादल को एक कवि की संज्ञा देते हुए उसे एक नई कविता की रचना करने को कहता है।

 

विकल    विकल,    उन्मन   थे   उन्मन

विश्व    के   निदाघ    के    सकल  जन,

आए  अज्ञात  दिशा  से अनंत  के घन !

तप्त       धरा,     जल       से       फिर

शीतल कर दो –


बादल, गरजो

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भावार्थ :-  कवि बादलो को क्रांति का प्रतिक मानते हुए यह कल्पना कर रहा है की वह हमारे अंदर सोये हुए पुरुषार्थ को फिर से जागकर हमें एक नया जीवन प्रदान करेगा। हमें जीने की नै आसा प्रदान करेगा। कवि इन पंक्तियों में कहता है की भीषण गर्मी के कारण दुनिया में सभी लोग तड़प रहे थे एवं व्याकुल थे की वे कहाँ जाए की इस तपती गर्मी से उन्हें राहत मिले परन्तु तभी किसी अज्ञान दिशा से घने काले बदल पुरे आकाश को ढक लेते हैं जिससे तपती धुप धरती तक नहीं पहुँच पाती और फिर घनघोर वर्षा कर वे गर्मी से तड़पती धरती की प्यास बुझाकर उन्हें शीतल एवं सांत कर देती है। और धरती के शीतल हो जाने पर सारे लोग भी भीषण गर्मी के प्रकोप से बच जाते हैं और उनका मन उत्साह से भर जाता है।

इसका अर्थ यह है की कवि हमें इससे यह सिख देने की कोशिश कर रहे हैं की धरती के सुख जाने के उपरंत भी जब वर्षा होती है तो उसमे नए पौधे उगने लगते हैं। उसी तरह हमें भी किसी कठिन परिस्थिति से हार कर अपने अंदर के पुरुषार्थ एवं जीवन जीने की आसा को कभी मरने नहीं देना चाहिए। हमें उत्साह से जीवन जीने की कोशिश करनी चाहिए।

 

अट नहीं रही है

आभा फागुन की तन

सट नहीं रही है।

भावार्थ :- प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने फागुन मास की सुंदरता का बहुत ही सुन्दर वखान किया है। होली के वक्त जो मौसम होता है उसे फागुन कहते हैं और उस समय प्रकृति अपने चरम सौंदर्य पर होती है और मस्ती से इठलाती है। फागुन के समय पेड़ पत्तों से भर जातें हैं उनमे रंग बिरंगे सुगन्धित फूल उग जाते हैं और इसी कारण जब हवा चलती है तो उनमे फूल की महक के कारण मादकता आ जाती है और उसी कारण सारे लोगों में भी मस्ती छा जाती है और वह मस्ती इतनी है की वह मन में रह नहीं पाती बहार निकलने लगती है।  

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कहीं साँस लेते हो,

घर-घर भर देते हो,

उड़ने को नभ में तुम

पर-पर कर देते हो,

आँख हटाता हूँ तो

हट नहीं रही है।

भावार्थ :-  इन पंक्तियों में कवि कहता है की घर घर में उगे हुए वृक्षों में रंग बिरंगे फूल खिले हुए और उनसे निकलने वाली खुसबू हवा में ऐसी बह रही है की मानो फागुन सांस ले रहा हो। और इस तरह वह पुरे वातावरण में मादकता भर देता है और इस मादकता के कारण पक्षी आकाश में अपने पर फ़ैऱाये उड़ने लगते हैं। और यह दृश्य और मस्ती से भरी हवाएं हमारे अंदर भी हलचल पैदा कर देती है और यह दृश्य हमें इतना अच्छा लगता है की हम अपनी आँख इससे हटा नहीं पाते। और हमें भी मस्ती से गाने एवं पर्व मानाने का मन करने लगता है।

 

पत्तों से लदी डाल

कहीं हरी, कहीं लाल,

कहीं पड़ी है उर में

मंद गंध पुष्प माल,

पाट-पाट शोभा श्री

पट नहीं रही है।

भावार्थ :-  कवि के अनुसार फागुन मास में प्रकृति इतनी सुन्दर नजर आती है की उस पर से नजर हटाने को मन नहीं करता। चरों तरफ वृक्षों में हरे पत्ते एवं लाल पत्ते दिखाई दे रहे हैं और उनके बिच रंग बिरंगे  फूल इस तरह प्रतीति हो रहें हैं की जैसे मानो वृक्षों ने रंग बिरंगी माला पहन रखी हो। जिसमे से भीनी भीनी निकलने वाली खुसबू बहुत ही मादक लग रही है। कवि यहाँ प्रकृति में आये बदलाव से बहुत ही खुस जान पड़ता है।