सूरदास के पद- Surdas Ke Pad Class 10: 2022

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Last updated on September 9th, 2022 at 03:14 pm

कक्षा – 10 ‘अ’ क्षितिज भाग 2

            पाठ 1

          सूरदास के पद

 

Hindi Kshitij Class 10 Poems Summary – Surdas Ke Dohe in Hindi With Meaning in Hindi :

 

                (1)

ऊधौ, तुम हौ अति बड़भागी।

अपरस रहत सनेह तगा तैं, नाहिन मन अनुरागी।

पुरइनि पात रहत जल भीतर, ता रस देह न दागी।

ज्यौं जल माहँ तेल की गागरि, बूँद न ताकौं लागी।

प्रीति-नदी मैं पाउँ न बोरयौ, दृष्टि न रूप परागी।

‘सूरदास’ अबला हम भोरी, गुर चाँटी ज्यौं पागी।

भावार्थ :- सूरदास जी के प्रस्तुत पंक्तियों में गोपियाँ ऊधौ (श्री कृष्ण के सखा) से वयंग्य करते हुए कह रहीं है की तुम बड़े भाग्यवान हो जो तम अभी तक कृष्ण के प्रेम के चक्कर में नहीं पड़े। गोपियों के अनुसार ऊधौ उस कमल के पत्ते के सामान है जो हमेशा जल में रहकर भी उसमे डूबता नहीं है और न ही उसके दाग धब्बो को खुद पर आने देता है। क्युकी ऊधौ कृष्ण के सखा हो कर भी उनके प्रेम के जाल में नहीं पड़े। गोपियों में फिर ऊधौ की तुलना किसी पात्र में रखे हुए जल में उपस्थित एक तेल के बून्द से की है जो निरंतर जल में रहकर भी उस जल से खुद को अलग रखता है। और यही कारण है की गोपियाँ ऊधौ को भाग्यशाली समझती हैं जबकि वें खुद को अभागिन अबला नारी समझती हैं क्युकीं वो बुरी तरह कृष्ण के प्रेम में पड़ चुकी हैं। उनके अनुसार श्री कृष्ण के साथ रहते हुए भी ऊधौ ने कभी कृष्ण के प्रेम रूपी दरिया में कभी पांव नहीं रखा और न ही कभी उनके रूप सौंदर्य का दर्शन किया। जबकि दूसरी और गोपियाँ कृष्ण के प्रेम में इस तरह पड़ चुकी है मानो जैसे गुड़ में चींटियाँ लिपटी हो।

 

           (2)

मन की मन ही माँझ रही।

कहिए जाइ कौन पै ऊधौ, नाहीं परत कही।

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अवधि अधार आस आवन की, तन मन बिथा सही।

अब इन जोग सँदेसनि सुनि-सुनि, बिरहिनि बिरह दही।

चाहति हुतीं गुहारि जितहिं तैं, उत तैं धार बही।

‘सूरदास’ अब धीर धरहिं क्यौं, मरजादा न लही।

भावार्थ :- सूरदास के प्रस्तुत पद में गोपियाँ ऊधौ से अपनी पीड़ा बताती हुई कह रहीं हैं की श्री कृष्ण के गोकुल छोड़ कर चले जाने के उपरांत उनकी मन में स्थित कृष्ण के प्रति प्रेम भावना मन में ही रह गई है। वे सिर्फ इसी आसा से अपने तन-मन की पीड़ा को सह कर जी रही थीं, की जब कृष्ण वापस लौटेंगे तो वे अपने -अपने प्रेम को कृष्ण के समक्ष वयक्त करेंगीं और कृष्ण के प्रेम की भागीदार बनेगीं। परन्तु जब उन्हें कृष्ण का योग- संदेश मिला जिसमे उन्हें पता चला की वे अब लौटकर नहीं आएंगे तो इस संदेश को सुनकर गोपियाँ टूट सी गई। और उनकी विरहा की वयथा और बढ़ गई है। अब तो उनके विरहा सहने का सहारा भी उनसे छीन गया अर्थात अब श्री कृष्ण वापस लौटकर नहीं आने वाले हैं। और इसी कारण अब उनकी प्रेम भावना संतुस्ट होने वाली नहीं है। उन्हें कृष्ण के रूप सौंदर्य को दुबारा निहारने का मौका अब नहीं मिलेगा। उन्हें ऐसा प्रतीत हो रहा है की अब वो हमेशा के लिए कृष्ण से बिछड़ चुकी हैं। और किसी कारण वस गोपियों के अंदर जो धैर्य बसा हुआ था अब वो टूट चूका है और वियोग में कह रही हैं की श्री कृष्ण ने सारी लोक मर्यादा का उल्लंघन किया है उन्होंने हमें धोका दिया है।

 

                (3)

हमारैं हरि हारिल की लकरी।

मन क्रम बचन नंद-नंदन उर, यह दृढ़ करि पकरी।

जागत सोवत स्वप्न दिवस-निसि, कान्ह-कान्ह जक री।

सुनत जोग लागत है ऐसौ, ज्यौं करुई ककरी।

सु तौ ब्याधि हमकौ लै आए, देखी सुनी न करी।

यह तौ ‘सूर’ तिनहिं लै सौंपौ, जिनके मन चकरी।

भावार्थ:- अपने इन पदों में सूरदास जी गोपियों के माध्यम से ऊधौ से यह कहना चाह रहे हैं की गोपियों के हृदय में श्री कृष्ण के प्रति अटूट प्रेम है जो की किसी योग के संदेश दवरा कम होने वाला नहीं है। बल्कि इनसे उनका प्रेम और भी दृढ़ हो जायेगा। आगे गोपियाँ ऊधौ से कह रही हैं की जिस तरह हारिल (एक प्रकार का पक्षी) अपने पंजो में लकड़ी को बड़ी ही ढृढ़ता से पकड़ा हुआ रहता है उसे कहीं भी गिरने नहीं देता उसी प्रकार हमने हरि (भगवान् श्री कृष्ण) को अपने ह्रदय में प्रेम रूपी पंजो से बड़ी ही ढृढ़ता से पकड़ा हुआ है। हमारे मन में दिन रात केवल हरि ही बसे रहते हैं। यहाँ तक की हम सपने में भी हरि का नाम रटते रहते हैं। और इसी वजह से हमें तुम्हारा यह योग संदेश किसी कड़वे ककड़ी की तरह लग रहा है। हमारे ऊपर तुम्हारे इस वियोग संदेश का कुछ असर होने वाला नहीं हैं। इसलिए हमें इस योग संदेश की कोई आवश्यकता नहीं है। फिर आगे गोपियाँ कहती हैं की तम यह संदेश उन्हें सुनाओ जिनका मन पूरी तरह से कृष्ण के भक्ति में डूबा नहीं और सायद वें यह संदेश सुनकर विचलित हो जाएँ। पर हमारे ऊपर तमहारे इस संदेश का कोई असर नहीं पढ़ने वाला है।

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                (4)

हरि हैं राजनीति पढ़ि आए।

समुझी बात कहत मधुकर के, समाचार सब पाए।

इक अति चतुर हुते पहिलैं ही, अब गुरु ग्रंथ पढ़ाए।

बढ़ी बुद्धि जानी जो उनकी, जोग-सँदेस पठाए।

ऊधौ भले लोग आगे के, पर हित डोलत धाए।

अब अपनै मन फेर पाइहैं, चलत जु हुते चुराए।

ते क्यौं अनीति करैं आपुन, जे और अनीति छुड़ाए।

राज धरम तौ यहै ‘सूर’, जो प्रजा न जाहिं सताए।

भावार्थ:- अपने प्रस्तुत पद में सूरदास जी ने हमें यह बताने का प्रयाश किया है की किस प्रकार गोपियाँ श्री कृष्ण के वियोग में खुद को दिलासा दे रहीं है। सूरदास गोपियों के माध्यम से कह रहें है की श्री कृष्ण ने राजनीति का पाठ पढ़ लिया है। जो की मधुकर (ऊधौ) के द्वारा सब समाचार प्राप्त कर लेते हैं और उन्ही को माध्यम बनाकर संदेश भी भेज देते हैं। ऊधौ जिसे यहाँ भँवरा कहकर दर्शाया गया है वह तो पहले से ही चालक है परन्तु श्री कृष्ण के राजनीति के पाठ पढ़ाने से अब वह और भी चतुर हो गया है। और हमें अपने छल कपट के माध्यम से बड़ी चतुराई के साथ श्री कृष्ण का योग संदेश दे रहे हैं। और कृष्ण की भी बुद्धि की दात देनी होगी जो हमें इस ऊधौ के जरिये संदेश दे रहे हैं। जिससे हम उन्हें भूल जाए। ऐसा को कतई नहीं होगा लेकिन हां इससे हमरा मन तो हमें वापस मिल जायेगा जो की श्री कृष्ण यहाँ से जाते समय चुराकर ले गए थे।

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उनके अनुसार बड़े लोग तो हमेशा दूसरों की भलाई के लिए परिश्रम करते हैं पर गोपियों को यह बात समझ में नहीं आ रही है की जो श्री कृष्ण दुसरो को न्याय का पाठ पढ़ाते हैं वे स्वयं इतना बड़ा अन्याय कैसे कर सकते हैं। उनके अनुसार किसी भी राजा का परम कर्तव्य यही होता है की वह अपनी प्रजा के सुख दुःख का ख्याल रखे। परन्तु यहाँ तो श्री कृष्ण स्वयं ही उन्हें दुःख दे रहे हैं। उन्हें चाहिए की वे अपना कर्तव्य निभाए और गोपियों के समक्ष प्रस्तुत होकर उन्हें दर्शन दे जिससे उनके हृदय में जल रही विरहा की पीड़ा सांत हो पाए।

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