आत्मकथा- जयसंकर प्रसाद (Atmakatha in Hindi by Jaishankar Prasad)

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कक्षा – 10 ‘अ’ क्षितिज भाग 2 पाठ 4

            आत्मकथा- जयसंकर प्रसाद

 

आत्मकथा का सारंश :

जयशंकर प्रसाद जी के मित्रो ने उनसे आत्मकथा लिखने का निवेदन किया और जयशंकर जी अपनी आत्मकथा नहीं लिखना चाहते थे। इसीलिए उनके मित्रो के निवेदन का मान रखते हुए प्रसाद जी ने इस काव्य की रचना की। इस काव्य में जीवन के प्रति अपने अनुभव का वर्णन किया है। उनके अनुसार यह संसार नश्वर है। क्युकी प्रत्येक जीवन एक न एक दिन मुरझाई हुई पत्ती सा टूट कर गिर जाता है। उन्होंने इस काव्य में जीवन के यथार्त एवं अभाव को दिखाया है की किस प्रकार हर आदमी कही न कही किसी चोट के कारण दुखी है फिर चाहे वो चोट प्रेमिका का न मिलना हो या फिर मित्रो के द्वारा धोका खाना हो। उनके अनुसार उन्होंने कुछ ऐसा कार्य नहीं किया है जो लोग उनके आत्म कथा में सुनकर वाह वाही करेंगे। उन्हें तो लगता है अगर उन्होंने अपने जीवन का सत्य सबको बताया तो लोग उनका उपहास उड़ाएंगे और उनके मित्र खुद को दोषी समझेंगे। कवि के अनुसार उनका जीवन सरलता एवं दुर्बलता से भरा हुआ है और उन्होंने जीवन में कोई महान कार्य नहीं किया। उनके अनुसार उनकी जीवन रूपी गगरी खाली ही रह गई है।
इस प्रकार हम कह सकते हैं प्रस्तुत पंक्तियों में जहां एक ओर कवि की सादगी का पता चलता है वहीँ उनकी महानता भी प्रकट होती है।


 

आत्मकथा का भावार्थ (Atmakatha Class 10 Summary) :

 

मधुप गुन-गुना कर कह जाता कौन कहानी यह अपनी,

मुरझाकर गिर रहीं पत्तियाँ देखो कितनी आज घनी।


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भावार्थ :- यहाँ कवि ने अपने मन को भँवरे की संज्ञा दी है जो गुनगुनाकर पता नहीं क्या कहानी कह रहा है। वह यह नहीं समझ पा रहा की वह अपनी जीवनगाथा की कौन सी कहानी कहे क्यूकी उसके समीप मुरझाकर गिरते हुए पत्ते जीवन की नस्वरता का प्रतिक है। और ठीक इसी तरह मनुष्य का जीवन भी एक एक न एक दिन समाप्त हो जाना है।

 

इस गंभीर अनंत-नीलिमा में असंख्य जीवन-इतिहास

यह लो, करते ही रहते हैं अपना व्यंग्य-मलिन उपहास

भावार्थ :-  कवि के अनुसार इस नीले आकाश जो की अनंत तक फैला हुआ है उसमे असंख्य लोगो ने अपने जीवन का इतिहास लिखा है जिसे पढ़कर कवि को ऐसा प्रतीत हो रहा है मनो उन्होंने स्वयं की आत्मखता लिखकर खुद का मज़ाक उड़ाया है और लोग इन्हे पढ़ पढ़ कर उन पर हंस रहे हैं।

 

तब भी कहते हो कह-डालूँ दुर्बलता अपनी बीती।

तुम सुनकर सुख पाओगे, देखोगे-यह गागर रीती।

भावार्थ :-  और इसी कारण वश कवि अपने मित्रो से यह प्रश्न करने के लिए बाध्य हो जाता है की क्या तुम भी यही चाहते हो मैं भी अपनी जीवन की सारी दुर्बलताएँ लिख डालूं। जिसे पढ़कर तुमलोग मेरी जीवन की खाली गगरी को देखकर मेरा मज़ाक बनाओ।

 

किंतु कहीं ऐसा न हो कि तुम ही खाली करने वाले-

अपने को समझो, मेरा रस ले अपनी भरने वाले।

भावार्थ :-  जिन मित्रो ने कवि से आत्म कथा लिखने का आग्रह किया था उनसे कवि कहते हैं की मेरी आत्मकथा पढ़कर और मेरे जीवन की गगरी खाली देख कर कहीं ऐसा ना ही की तुम खुद को मेरी दुखो का कारण समझ बैठो और यह सोचने लग जाओ की तुम्ही ने मेरी जीवन रूपी गगरी को खाली किया है।

 

यह विडंबना! अरी सरलते तेरी हँसी उड़ाऊँ मैं।

भूलें अपनी या प्रवंचना औरों को दिखलाऊँ मैं।


भावार्थ :- कवि का तातपर्य यह है की उनका स्वभाव बहुत ही सरल है और पानी इसी स्वभाव के कारण उन्हें कई लोगो ने धोका दिया जिनसे उन्हें कष्ट सहना पड़ा। परन्तु इसके बाउजूद भी कवि को अपने स्वभाव पे कोई मलाल नहीं है और वो अपनी आत्मकथा में इसका मज़ाक नहीं उड़ाना चाहते और ना ही वो अपने भूल बताने चाहते हैं और ना ही वो छल-कपट गिनाना चाहते हैं जो उन्हें सहने पड़े।

 

उज्ज्वल गाथा कैसे गाऊँ, मधुर चाँदनी रातों की।

अरे खिल-खिला कर हँसते होने वाली उन बातों की।

भावार्थ :- कवि के अनुसार उनके प्रेमिका के साथ बिताए हंसी पल जो की चांदनी रातों में बीतये गए थे और उनकी प्रेमिका के साथ हंस हंस कर बात करना ये सारे अनुभव उनके निजी हैं। वो ये अनुभव कैसे ? और क्यों ? अपने आत्मकथा में लिखकर लोगो को सुनाये ये तो उनके जीवन की पूंजी है और इस पर सिर्फ और सिर्फ उनका हक़ है।

 

मिला कहाँ वह सुख जिसका मैं स्वप्न देखकर जाग गया।

आलिंगन में आते-आते मुसक्या कर जो भाग गया।

भावार्थ :- कवि के अनुसार जीवन भर उन्होंने जिन सुखों की कल्पना की और जिनके सपने देखकर कवि कभी कभी जाग जाता था। उनमे से कोई भी सुख उन्हें नहीं मिला। कवि ने जब भी आपने हातो को फैलाकर अपनी प्रेमिका को अर्थात उन सुखों को गले लगाना चाहा तब तब उनकी प्रेमिका मुस्कुरा कर भाग गई।

 

जिसके अरुण-कपोलों की मतवाली सुंदर छाया में।
अनुरागिनि उषा लेती थी निज सुहाग मधुमाया में।

भावार्थ :- प्रस्तुत पंक्तियों में कवि अपनी प्रेमिका की सुंदरता का बखान करते हुए कहते हैं की उनकी प्रेमिका के गाल लाल लाल इतने सुन्दर थे की उषा भी अपनी लालिमा उसी से उधार लेती थी।  

 

उसकी स्मृति पाथेय बनी है थके पथिक की पंथा की?

सीवन को उधेड़ कर देखोगे क्यों मेरी कंथा की?

भावार्थ :- कवि कहता है की उनके प्रेमिका के साथ बीतये हंसी पल को याद कर के आज कवि इस अकेले संसार में अपना जीवन वयतीत कर रहा है और उनके जीवन का एक मात्र सहारा यही यादें है तो क्या तुम (मित्र) मेरी उन यादों को देखना चाहते हो। और इस प्रकार मेरी आत्मकथा पढ़कर मेरी भूली हुई यादों को फिर से कुरेदना चाहते हो और मेरी एवं रूपी चादर को तार तार करना चाहते हो।

 

छोटे से जीवन की कैसे बड़ी कथाएँ आज कहूँ?

क्या यह अच्छा नहीं क़ि औरों की सुनता मैं मौन रहूँ ?

भावार्थ :- प्रस्तुत पंक्तियों में जयशंकर प्रसाद जी के महानता का पता चलता है। उनके अनुसार उनका जीवन बहुत ही सरल और सादगी भरा है। वह स्वयं को तुछ्य मनुष्य मानते हैं और उनके अनुसार उन्होंने जीवन में ऐसा कोई कार्य नहीं किया जिससे वो खुद के बारे में बड़ी-बड़ी यश-गाथएँ लिख सकें। इसलिए वो चुप रहना ही उचित समझते हैं और दुसरो की गाथाओं को सुनते हैं।

 

सुनकर क्या तुम भला करोगे मेरी भोली आत्म-कथा?

अभी समय भी नहीं, थकी सोई है मेरी मौन व्यथा।

भावार्थ :- प्रस्तुत पंक्तियों में कवि अपने मित्रो से कहते हैं की तुम मेरी भोली-भाली, सीधी-साधी आत्मकथा सुनकर भला क्या करोगे। उसमे तुम्हारे काम लायक कुछ भी नहीं मिलेगा। और मैंने ऐसा कुछ महानता का कार्य भी नहीं किया जिनका वर्णन मैं कर सकू। और अभ मेरे जीवन के सारे दुःख सांत हो गए हैं और मुझमे अब उन्हें लिखने की इच्छा नहीं।

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